देहरादून

कंक्रीट के जंगलों में गुम होती देहरादून की लीची: विकास की दौड़ में खो रहा पहचान का स्वाद

देहरादून, 18 मई 2025 – एक समय था जब देहरादून की फिजाओं में लीची के बागानों की भीनी खुशबू घुली रहती थी। लेकिन अब वही बागान धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रहे हैं। विकास की अंधी दौड़, बढ़ती आबादी और रियल एस्टेट के विस्तार ने देहरादून की पहचान रही लीची को संकट में डाल दिया है।

बागानों की जगह बन रही इमारतें
राजधानी देहरादून के डोईवाला, प्रेमनगर, नेहरू कॉलोनी और रायपुर जैसे इलाकों में जहां कभी दूर-दूर तक लीची के बागान फैले होते थे, वहां अब बहुमंजिला इमारतें और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स नजर आते हैं। बागों की जमीनें प्लॉट में बदली जा रही हैं और किसान धीरे-धीरे इस परंपरागत खेती से मुंह मोड़ते जा रहे हैं।

प्राकृतिक पारिस्थितिकी पर असर
लीची के बागान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। ये न केवल वातावरण को ठंडा बनाए रखते हैं, बल्कि पक्षियों और मधुमक्खियों के लिए भी आश्रय स्थल होते हैं। लेकिन जब पेड़ कटते हैं और उनकी जगह सीमेंट और लोहे की संरचनाएं बनती हैं, तो प्राकृतिक संतुलन भी बिगड़ता है।

सरकार और समाज की भूमिका जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए तो देहरादून की लीची केवल इतिहास की किताबों में ही रह जाएगी। जरूरी है कि सरकार बागवानों को प्रोत्साहन दे, लीची को ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग’ दिलाए और लीची आधारित पर्यटन को बढ़ावा दे। देहरादून की लीची केवल एक फल नहीं, बल्कि इस शहर की सांस्कृतिक और कृषि धरोहर है। अगर हम इसे बचाना चाहते हैं, तो विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना होगा। वरना आने वाली पीढ़ियां शायद लीची के पेड़ सिर्फ तस्वीरों में ही देख पाएंगी।

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